गरीबी शायरी

SHAYARI ON GARIBI /गरीबी

SHAYARI ON GARIBI /गरीबी-

” गरीबी को कागज पर, उतार कर आमिर बन
अमीर बन
जाते है, लोग
ये कैसा मुल्क है जहा, दर्द नहीं
दर्द की तस्वीर
खरीद लेते है लोग ,

“बड़ी हसरत है की,
कोई मेरी तारीफ में,
दो शब्द कहे”

ये दुनिया उसी को मति है,
जिसको ‘हालातों’ ने मारा हो ।

ye duniya usee ko mati hai, jisako haalaaton ne maara ho

भगवान भी रो पड़े जब
एक गरीब के बच्चे ने उसके
सामने कहा
“भगवान जी ये मुझे
रोज भूख क्यों लगती है”

पैसे होते तो खिलौने
लेकर देता
वरना
मेरे बच्चे क्या में तुझे
रोने देता

“गरीबी”
बहुत कुछ सीखा देती है ।

बड़ी बेशर्म होती है ये गरीबी
कम्बख्त उम्र का भी लिहाज नहीं करती

वो जो मुस्कुराहट लुटाते है.
वो अक्सर तिजोरिया नहीं
रखते हैं..

क्या ख्वाहिशें होगी उस गरीब
की जिनकी सांसें
भी गुब्बारे में भरकर बिकती हैं..

दिखने में वो गरीब थे साहब
मगर उनकी हंसी नवाबो से कम नहीं

कुछ लोग कह गए
की पैसे ही सब
कुछ नहीं होता है
लेकिन उन्हें क्या
पता गरीब के लिए
१ रूपये की भी क्या
कीमत होती है।

खाली जेब और भूके पेट के साथ
तमाम ” दुनियादारी”
समझ आ जाती है

तहजीब की मिसाल गरीबों के घर पे है,
दुपट्टा फटा हुआ है मगर उनके सर पे है।

गरीबी बन गई तश्हीर का सबब आमिर,
जिसे भी देखो हमारी मिसाल देता है।

जनाजा बहुत भारी था उस गरीब का,
शायद सारे अरमान साथ लिए जा रहा था।

रुखी रोटी को भी बाँट कर खाते हुये देखा मैंने,
सड़क किनारे वो भिखारी शहंशाह निकला।

वो जिसकी रोशनी कच्चे घरों तक भी पहुँचती है,
न वो सूरज निकलता है, न अपने दिन बदलते हैं।

GARIBI PAR SHAYARI

वो राम की खिचड़ी भी खाता है,
रहीम की खीर भी खाता है,
वो भूखा है जनाब उसे,
कहाँ मजहब समझ आता है।

गरीबों की औकात ना पूछो तो अच्छा है,
इनकी कोई जात ना पूछो तो अच्छा है,
चेहरे कई बेनकाब हो जायेंगे,
ऐसी कोई बात ना पूछो तो अच्छा है।

खिलौना समझ कर खेलते जो रिश्तों से,
उनके निजी जज्बात ना पूछो तो अच्छा है,
बाढ़ के पानी में बह गए छप्पर जिनके,
कैसे गुजारी रात ना पूछो तो अच्छा है।

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